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ऐसे ही देवभाषा नहीं कहलाती है संस्कृत, संस्कृत के हैरान करने वाले रहस्य

संस्कृत भाषा
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संस्कृत भारतीय उपमहाद्वीप की एक ऐसी भाषा जो विश्व की सबसे प्राचीन एवम् समृद्ध भाषा मानी जाती हैं। संस्कृत को वर्तमान भाषाओं की जननी भी कहाँ जाता हैं। आदिकाल से संस्कृत को हमारे देश में एवम् हिंदू धर्म में एक अहम दर्जा प्राप्त है। यह भाषा भारत की एक प्रमुख भाषा भी रह चुकी हैं। लेकिन समय के साथ इस भाषा का पतन होता रहा।

आजकल तो हमारे देश में अंग्रेजी में बोलना शान की बात मानी जाती हैं। लेकिन जब आप संस्कृत भाषा में छिपे रहस्यों और रोचक तथ्यों के बारे में जान लोंगे। तब आपको अपनी संस्कृत भाषा पर भी काफी गर्व होंगा। आइए जानते है। उन रहस्यों के बारे में।

दुनिया भर के भाषाओं का मूल आधार मानव द्वारा, पशु- पक्षियो द्वारा निकाले गए ध्वनि संकेत है। लेकिन संस्कृत भाषा मानव या फिर पशु- पक्षियो द्वारा निकाले गए ध्वनि संकेतों पर आधारित और निर्मित नहीं है।

• संस्कृत भाषा एक अपौरुष भाषा है। जिसकी उत्पत्ति ब्रम्हांड से निकले ध्वनि संकेतों पर आधारित हैं। हम सब जानते हैं कि, ब्रम्हांड मे कहीं तरह के ग्रह, तारे और आकाशगंगा मौजूद हैं। इन सभी मे अलग-अलग तरह की गती निहित हैं। ब्रम्हांड मे इस गती के कारण निर्माण होने वाले ध्वनि तरंगों से हमारे ऋषि मुनियों ने अपनी ध्यान साधना से इन्हें महसूस किया और इन सभी ध्वनि तरंगों को लिपी मे बांधकर संस्कृत की रचना की।

विज्ञान भी कहता हैं कि सूर्य से अलग अलग तरह की किरणे धरती पर आती हैं। और इन किरणों का हमारे संस्कृत भाषा के निर्मिती में भी काफी योगदान है।

सूर्य के एक ओर से ९ तरह की रोशनी निकलती है। इस प्रकार सूर्य के चारों ओर से ९-९ तरह की रोशनी निकलती है। अगर इन सभी ९-९ तरह के रोशनी को मिलाया जाता है। तो वह ३६ तरह की रोशनीयां बनती है। जब यह ३६ तरह की रोशनिया धरती पर आती है। तब इनसे ३६ प्रकार के ध्वनि तरंगें निर्माण होते है। इन ३६ तरंगों से ही संस्कृत भाषा में ३६ स्वरों की निर्मिती हुई है।

हिंदू धर्म ग्रंथों में ८ वसु बताये है। जो इंद्र के रक्षक माने जाते हैं। वसु यानी वासी, या फिर वसने वाला। जब सूर्य से निकली ९ तरह की रोशनी धरती पर मौजूद इन ८ वसुओ से जब टकराती है। तब (९*८=७२) तरह के ध्वनि तरंग निर्माण होते है। इन सभी ७२ ध्वनि तरंगों से संस्कृत में ७२ व्यंजन की निर्मिती हुई है।

इस प्रकार संस्कृत भाषा में १०८ की वर्णमाला है।

वेदों की जानकारी रखने वाले विद्वानों का कहना है कि, ब्रम्हांड के ध्वनियों का वर्णन हमें वेदों में मिलता है।

विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों को माना जाता है। और वेदों की रचना संस्कृत में हुई है। इस कारण संस्कृत भाषा दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा मानने मे कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

संस्कृत भाषा को वर्तमान में मौजूद भारतीय भाषाओं की जननी भी कहा जाता है। हिंदी, मराठी, बांग्ला जैसी आधुनिक भाषाओं की निर्मिती संस्कृत भाषा से हुई है।

संस्कृत भाषा

Sanskrit

संस्कृत भाषा के व्याकरण को विश्व में सर्वोत्तम व्याकरण भी कहा जाता है। यह वेदों का प्रमुख अंग भी है। संस्कृत भाषा का व्याकरण अपने आप में एक परिपूर्ण होने के कारण, यह व्याकरण दुनियाभर के भाषा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर हमेशा आकर्षित करता है। जानकारों का मानना है कि, संस्कृत भाषा के व्याकरण से ही अन्य भाषाओं का व्याकरण विकसित हुआ है।

दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है जो स्वविकासित भाषा नहीं बल्कि रचनात्मक भाषा है। इस भाषा की रचना करने वाले उन विद्वानों में महर्षि पाणिनी इन्होंने संस्कृत व्याकरण पर आधारित “अष्टाध्यायी” ग्रंथ की रचना की, महर्षि कात्यायन और योग के निर्माता महर्षि पतंजलि प्रमुख है।

दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा जिसमें उसके प्रत्येक शब्द के २७ रूप होते हैं।

संस्कृत भारत में कई लिपियों द्वारा लिखी जाती रही है। परंतु वर्तमान समय में इस भाषा का देवनागरी लिपि से गहरा संबंध स्थापित है। वास्तव में देवनागरी लिपि का निर्माण संस्कृत के लिए ही किया गया है।

वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि संस्कृत भाषा कंप्यूटर लैंग्वेज प्रोग्रामिंग के लिए एक उत्तम भाषा मानी जाती है।

संस्कृत भाषा में वाक्य के शब्द को किसी भी स्थान पर या क्रम में रखने पर वाक्य का मूल अर्थ बदलने की संभावना ना के बराबर है।

अंतरिक्ष में संदेश भेजने के लिए यह भाषा काफी उपयुक्त भाषा है। कही बार अंतरिक्ष में मौजूद अंतरिक्ष यात्री को संदेश भेजने पर वाक्यों के शब्दों का उलटफेर हो जाता था जिसके कारण अंतरिक्ष यात्री को संदेश समझनेमें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। इस दिक्कत को दूर करने के लिए कई भाषाओं का प्रयोग किया गया लेकिन यह दिक्कत खतम नहीं हुई। जब वैज्ञानिकों ने संस्कृत भाषा का उपयोग किया तब पाया गया कि संस्कृत अंतरिक्ष संदेश के लिए एक उत्तम भाषा है। क्योंकि इस भाषा में शब्दों के उलटफेर होने से वाक्य का मूल अर्थ बना रहता है।

विश्व के सभी भाषाओं में केवल दो प्रकार के वचन मौजूद है। वह दो वचन एकवचन और अनेकवचन है। पर संस्कृत में तीन प्रकार के वचन है। संस्कृत में द्विवचन एक्स्ट्रा है।

संस्कृत भाषा की साहित्य रचना मुख्य रूप से पद्य में है। जब की बाकी भाषाओं की साहित्य रचना गद्य में है।

अन्य भाषाओं की तुलना में संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

बोलने में जीभ की सभी मासपेशियों उपयोग करने वाली एकमात्र ऐसी भाषा।

संस्कृत भाषा बोलने वाले लोग में बाकी लोगों की तुलना में रक्तदाब, मधुमेह जैसे रोगों का प्रमाण कम देखा गया है।

यह भाषा हमारी एकाग्रता बढ़ाने में काफी मदतगार है।

संस्कृत भाषा में प्रकाशित होने वाला ‘सुधमी‘ पहला अखबार है।

कर्नाटक राज्य के मुत्तुर गाव के रहीवासी आज भी संस्कृत में बात करते हैं।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी का मानना था कि संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी होने के कारण भारत की सभी भाषाएँ इस भाषा से प्रभावित है। इसलिए संस्कृत एकलौती ऐसी भाषा है। जो भारत को भाषाई एकता मे बांधने में सक्षम है। अंततः उन्होंने संस्कृत को देश की राष्ट्रीय भाषा बनाने का सुझाव दिया था।

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भारत के संविधान में अनुसूचित २२ भाषाओं में संस्कृत भाषा को भी सम्मिलीत किया गया है।

अगर आपको यह जानकारी अच्छी लगे तो comments जरूर करें।

 

धन्यवाद!!!!!!!!!

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