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कैसे होती है EVM की सुरक्षा? क्या EVM की सुरक्षा पर संदेह करना सही है?

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हम सब जानते हैं कि, हमारे देश में छोटे चुनाव से लेकर बड़े से बड़े चुनाव में भी EVM यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का यूज किया जाता है और हम यह भी जानते है कि, EVM पर वोटिंग होने तक तो सभी दल EVM पर विश्वास रखते हैं। लेकिन जब मतगणना होती है, तब चुनाव हारने वाले प्रत्याशी या पार्टियां EVM से छेड़खानी होने का दावा करते हैं और अपने हार का ठीकरा EVM पर फोड़ देते हैं।

न्यूज में भी हम कई बार प्रत्याशीयो को कहते हुए देखते हैं कि, EVM मशीन को सत्ताधारियो द्वारा बदला गया है इसलिए वे चुनाव हार गए हैं।

फिर सवाल उठता है कि, क्या EVM मशीन के साथ छेड़खानी की जा सकती है? क्या EVM को बदला जा सकता है? क्या इतना आसान है चुनाव आयोग के चक्रव्यूह को भेदना? आइए जानते हैं। इस लेख में EVM के सुरक्षा के बारे में।

सबसे पहले हम जानेंगे चुनाव से पहले ईवीएम कहा रखी होती है?

आपको जानकर हैरानी होगी कि, चुनाव से पहले सभी ईवीएम मशीनें जिले के एक गोदाम में रखी होती है। जिसकी निगरानी करने का जिम्मा जिले के DEO यानी डिस्ट्रिक्ट इलेक्टोरल ऑफिसर का होता है। यहा अगर कोई भी चूक होती है तो उसका जवाब DEO को देना पड़ता है।

EVM रखे इस गोदाम की सुरक्षा में पुलिस बल को हमेशा तैनात करके रखा जाता है। इसके अलावा गोदाम की सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने के लिए चारो ओर सीसीटीवी कैमेरे लगाए जाते है। इसके अलावा सुरक्षा को ध्यान में रखकर कोई भी व्यक्ति चाहे वह नेता ही क्यों ना हो, चुनाव आयोग को बिना सूचित किए गोदाम के अंदर प्रवेश नहीं कर सकता। इसके लिए उसे परमिशन लेनी होती है और तो और चुनाव आयोग के परमिशन के सिवा गोदाम से एक भी EVM बाहर या बाहर से अंदर नहीं जा सकती।

जब चुनाव नजदीक आते हैं, तब चुनाव आयोग सभी EVM मशीनो की जांच सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने इंजीनियर के हाथों से की जाती है। इस जांच में किसी भी मशीन में अगर कोई भी गड़बड़ी नज़र आती है। तो उस गड़बड़ी को राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने ही इंजीनियर ठीक करते हैं। ताकि EVM मशीनो को लेकर कोई भी संदेह राजनीतिक दलों के मन में ना रहें।

इसके बाद जब चुनाव की तारीख नजदीक आती है, तब चुनाव आयोग बिना किसी क्रम के EVM मशीनो को बाट देती है। जब चुनाव आयोग द्वारा मशीनों का आवंटन किया जाता है, तब भी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधी वहा मौजुद होते है। अगर किसी पार्टी के प्रतिनिधी वहा किसी कारणवश मशीनों के आवंटन के समय उपस्थित नहीं रह पाते हैं तो उस पार्टी के कार्यालय को चुनाव आयोग EVM मशीनो की और वीवीपीएटी के आवंटन की एक लिस्ट सौप देती है।

इस आवंटन के कवायत के बाद आवंटित की गई मशीनो को जिस स्टोर रूम और स्ट्रॉन्ग रूम में रखा जाता है। उसके देखरेख का जिम्मा अब रिटर्निंग ऑफिसर को दिया जाता है।

इसके बाद फिर रिटर्निंग ऑफिसर के देखरेख में रखी गई EVM मशीनो का दुबारा आवंटन अलग अलग मतदान केंद्रों पर किया जाता है। इस आवंटन के समय भी सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधी मौजुद होते है।

जब सभी EVM मशीनो का मतदान केंद्रों में आवंटन किया जाता है, तब उसके बाद इन सभी मशीनों के सीरियल नंबर की लिस्ट को पार्टियों संग साझा किया जाता है। आपको बता दें कि, राजनीतिक पार्टियों के लोग इन सीरियल नंबर का मिलान EVM के साथ करके भी देख सकते हैं। यह सब मतदान निपक्षता के लिए किया जाता है।

आपको बता दें कि, जब EVM मशीनें स्ट्रॉन्ग रूम से निकलकर मतदान केंद्रों के लिए रवाना होती है, तब सभी पार्टियों को इसकी सूचना दी जाती है। पार्टियों को समय, तारीख और रूट के बारे में जानकारी दी जाती है।

 

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Photo credit:- eci.gov.in

मतदान के दिन अगर कोई ईवीएम मशीन बीच में ही खराब हो जाए तो नई मशीन लगाई जाती है। इसके लिए पहले ही अतिरिक्त मशीनों का बंदोबस्त सभी पार्टियों के देखरेख में चुनाव आयोग करके रखता है।

जब मतदान खत्म हो जाता है, तब मतदान खत्म होते ही ईवीएम को स्ट्रॉन्ग रूम नही भेजा जाता। ईवीएम को स्ट्रॉन्ग रूम में भेजने से पहले प्रिजाइडींग ऑफिसर EVM में डाले गए वोटों का परीक्षण करता है। यह परीक्षण भी प्रिजाइडींग ऑफिसर पार्टियों के प्रतिनिधीयो के सामने करता है और उस परीक्षण की एक एक कॉपी पार्टियों के प्रतिनिधीयो को देता है।

इसके बाद EVM मशीन को पार्टियों के सदस्य और पदाधिकारियों के सामने सील लगाया जाता है। पार्टी के प्रत्याशी या उनके पोलिंग एजेंट EVM मशीन सील होने के बाद अपने हस्ताक्षर करते हैं। यह हस्ताक्षर इसलिए लिए जाते है कि, EVM को सील करते वक्त यह लोग वहा मौजुद थे। उनके सामने EVM को सील लगाया गया है।

EVM मशीनें सील करने के बाद उन्हें स्ट्रॉन्ग रूम में जमा करने के लिए ले जाया जाता है। जब मशीने स्ट्रॉन्ग रूम में जाने के लिए निकलती है, तब पार्टी के प्रत्याशी या उनके प्रतिनिधी मतदान केंद्र से स्ट्रॉन्ग रूम तक EVM के साथ जा सकते है।

जब ईवीएम मशीनें स्ट्रॉन्ग रूम में जमा हो जाती है, तब स्ट्रॉन्ग रूम को सभी प्रत्याशियों या उनके प्रतिनिधीयो के सामने सील लगाया जाता है। आपको बता दें कि, यहां स्ट्रॉन्ग रूम को सील पार्टी के लोग अपने हाथ से भी लगा सकते हैं। स्ट्रॉन्ग रूम को सील लगने के बाद उसके सुरक्षा का जिम्मा जिले के कलेक्टर और एसपी के कंधों पर होता है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि, अगर स्ट्रॉन्ग रूम में सेंध लगने का डर किसी पार्टी या प्रत्याशी को लगता है। तो वह अपने कार्यकर्ताओं को भी स्ट्रॉन्ग रूम की देखरेख के लिए वहा रख सकते है। इसकी इजाजत खुद चुनाव आयोग उन्हे देता है।

एकबार स्ट्रॉन्ग रूम सील होने के बाद गिनती के दिन ही खोले जाते है। अगर बीच में स्ट्रॉन्ग रूम को खोलने की जरूरत पड़ी तो उसकी सूचना सभी राजनीतिक पार्टियों और प्रत्याशियों को दी जाती है और उनके मौजूदगी में ही स्ट्रॉन्ग रूम को खोला जाता है।

अब सबके दिमाग में यह भी सवाल उठ रहा होगा कि, स्ट्रॉन्ग रूम कितना सुरक्षित होता है ? आइए जानते हैं इस बारे में।

आपको जानकर हैरानी होगी कि, स्ट्रॉन्ग रूम में केवल एक तरफ से ही एंट्री का प्रावधान है। स्ट्रॉन्ग रूम में एक से ज्यादा एंट्री पॉइंट नही होते हैं। अगर किसी स्ट्रॉन्ग रूम में एक से ज्यादा एंट्री पॉइंट है, फिर वह चाहे खिड़की ही क्यों ना हो। तो उसे सुनिश्चित किया जाता है कि, उसके माध्यम से कोई भी स्ट्रॉन्ग रूम में दाखिल ना हो सके। इसके अलावा स्ट्रॉन्ग रूम को डबल लॉक सिस्टम होता है। जिसकी एक चाबी रिटर्निंग ऑफिसर के पास होती है और दुसरी चाबी संबंधित लोकसभा क्षेत्र के असिस्टेंट ऑफीसर के पास होती है।

स्ट्रॉन्ग रूम के सुरक्षा को ध्यान में रखकर CCTV को चारो तरफ लगाया जाता है और तो और सुरक्षा बल भी चौबीसों घंटे वहा तैनात रहते हैं। इतना ही नहीं सुरक्षा बल के पास भी एक रजिस्टर होता है। जिसमें हर व्यक्ती के एंट्री का टाइम, तारिख, नाम आदि दर्ज करके रखा जाता है। यह सब के लिए जरूरी होता है। फिर वह चाहे पर्यवेक्षक, एसपी, पार्टी प्रतिनिधी, प्रत्याशी या फिर कोई भी बड़ा व्यक्ती क्यों ना हो। सभी का रेकॉर्ड लिया जाता है।

इन सारे मानकों का पालन हर हाल मे हर किसी को करना होता है। तभी चीजे आगे बढ़ पाती है।

वोटों के गिनती के पहले दिन जहां वोटों की गिनती होनी है उस काउंटिंग हॉल की और स्ट्रॉन्ग रूम की अच्छे से बैरेकेडिंग की जाती है। अगर काउंटिंग हॉल और स्ट्रॉन्ग रूम में ज्यादा अंतर नहीं है तो दोनों के बिच में एक मजबूत घेरा बनाया जाता है। ताकी कोई भी व्यक्ति स्ट्रॉन्ग मे ना घुस सके।

जिस दिन वोटों की गिनती करनी होती है, उस दिन परिसर में अतिरिक्त CCTV कैमेरो को और पुलिस बल को लगाया जाता है। ताकी कोई अनहोनी ना हो और हर गतिविधी को रेकॉर्ड किया जा सके।

इसके अलावा वोटों की गिनती करने से पहले सभी प्रत्याशियों को लिखित सूचना दी जाती है। ताकी वे आकर हालात का जायजा ले सके और यह सुनिश्चित कर सके कि, सब ठीक है।

दोस्तों यह थीं EVM के सुरक्षा से जुड़ी जानकारी। आपको कैसी लगी हमे कमेंट बॉक्स में जरूर बताए।

यह भी पढ़े :- ईवीएम भरोसे लायक ना होने की 10 बड़ी वजह

यह लेख BBC news मे दिए जानकारी से प्रेरित है। जिसे सरल शब्दों में यहां प्रस्तुत किया है।

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