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Varadaraja perumal temple kamchipuram, 40 साल में एकबार होते है यहाँ भगवान के दर्शन, 40 साल में एकबार जल समाधि से बाहर आते है भगवान अत्ति वरदराज

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      दोस्तों हमारी दुनिया कई सारे रहस्यों से भरी पड़ी है। दुनिया में कई ऐसी जगह मौजूद है। जो अपने रहस्यों के कारण हमेशा इसनों के आकर्षण का केंद्र रही है।हमारा देश भी कई रहस्यों से भरा पड़ा है। इन रहस्यों मे कुछ मंदिरों के रहस्य काफी interesting है। 

       दोस्तों आज हम बात करने वाले है। कांचीपुरम के एक ऐसे ही रहस्यमयी मंदिर के बारे में। जिसका नाम है अत्ति वरदराज पेरुमल मंदिर। दुनिया के सात सबसे पुराने शहरों में शामिल हमारा काचीपुराम भी है। यह शहर तमिलनाडु राज्य मे स्थित है। इस शहर में वैसे कई मंदिर स्थित है। पर इन मंदिरों में 125 ऐसे मंदिर है जो अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। इन सभी मंदिरों का अपना-अपना एक अलग सा इतिहास रहा है। लेकिन हम जानने वाले है अत्ति वरदराज पेरुमल मंदिर और भगवान विष्णु के वरदराज रूप के प्रतिमा के बारे में। जो की अंजीर की लकड़ी से बनी है। दोस्तों इस मंदिर की बात भी कुछ ओर है और इसका कारण भी खास है। दक्षिण भारत के कांचीपुरम का एक अदभुत मंदिर इसे माना जाता है। हमने कई रहस्यमयी और चमत्कारी मंदिरों के बारे में सुना और पढ़ा होंगा। लेकिन यह मंदिर ऐसा है कि यहा भगवान 40 वर्षों बाद अपने भक्तों को एक बार दर्शन देते है। आईए जानते हैं इस मंदिर के बारे में। 

मंदिर क्षेत्र

 



कांचीपुरम के प्रमुख मंदिरों में से एक है अत्ति वरदराज पेरुमल मंदिर। यह मंदिर कांची मे लगभग 23 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इस मंदिर के 23 एकड़ क्षेत्र में दो सरोवर और कुछ छोटे मंदिर भी है। इस मंदिर में एक 400 पिलर वाला हॉल है, जो तीन मंजिला इमारत के समान ऊँचा है। इस मंदिर की ओर आने वाले रास्तो पर हमेशा सुरक्षा कर्मी तैनात रहते है। जो श्रद्धालुओ को सुरक्षा के साथ साथ मार्गदर्शन भी करते है। इस मंदिर का दक्षिण भारत में एक खास पौराणिक महत्व है। यह मंदिर मूलतः भगवान विष्णु जी का है। लेकिन इस मंदिर के इतिहास और कथा मे भगवान ब्रम्हा और उनकी पत्नी लक्ष्मी सावित्री भी जुड़ी हुई हैं। मंदिर के परिसर में एक वेगवती नाम की नदी भी बहती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह नदी लक्ष्मी सावित्री का रूप है। 

क्यों 40 वर्ष तक भगवान अत्ति वरदराज सरोवर में रहते है? 

       इस सवाल को लेकर कई कहानियाँ प्रचलित है। इन कहानियों में, पुरानो में बताई गई कहानी और एक मुगलों से जुड़ी कहानी काफी प्रचलित  है। 

        सबसे प्राचीन कहानी पुरानो के अनुसार भगवान ब्रम्हा से जुड़ी कहानी है। अत्ति वरदराज मंदिर से जुड़े लक्ष्मीनारायण पेरुमल ट्रस्ट के प्रमुख संतानम ने दैनिक भास्कर को बताया कि, यह भूमि ब्रम्हाजी के यज्ञ की भूमि है। भगवान ब्रम्हाजी एकबार यज्ञ करने के लिए यहा आए थे। पुरानो के अनुसार यज्ञ में पत्नी का होना आवश्यक होता है। जब ब्रम्हाजी यहाँ यज्ञ करने के लिए आए तब उनकी पत्नी लक्ष्मी सावित्री यहाँ उपस्थित नहीं थी। तब इस समस्या को हल करने के लिए ब्रम्हाजी ने माता गायत्री को यज्ञ विधी मे शामिल किया। जब लक्ष्मी सावित्री ने यज्ञ में ब्रम्हाजी के साथ माता गायत्री को देखा, तो वह काफी क्रोधित हो गयी। क्रोध में आकर लक्ष्मी सावित्री ने यज्ञ को नष्ट करने के लिए नदी का रूप धारण किया। अपने प्रचंड वेग के कारण इस नदी को वेगवती नदी कहा जाने लगा। बताया गया है कि, वेगवती नदी का प्रवाह इतना गतिशील था कि, अपने वेग के कारण कांची मे तबाही मच गयी थी। तब कांची को लक्ष्मी सावित्री के प्रकोप से बचाने के लिए स्वयम भगवान विष्णु को आना पड़ा। भगवान विष्णु ने अपने शरीर से वेगवती नदी को रोक दिया। नदी के वेग को रोकने के लिए भगवान विष्णु भूमि पर दीवार की तरह लेट गए। जब ब्रम्हाजी का यज्ञ पुरा हुआ तो ब्रम्हाजी ने देवशिल्पी विश्वकर्मा को भगवान विष्णु की प्रतिमा बनाने का आदेश दिया। ब्रम्हाजी के कहने पर देवशिल्पी विश्वकर्मा ने अंजीर की लकड़ियों से भगवान विष्णुजी की प्रतिमा बनाई। अंजीर से बने इस प्रतिमा का नाम अत्ति वरदराज पड़ा। अत्ति का अर्थ होता है अंजीर की लकड़ी। माना जाता है कि पहले इस जगह अंजीर के पेड़ों का घना जंगल हुआ करता था। वरदराज का अर्थ ‘हर तरह का वरदान देने वाला’ होता है। 

         जब ब्रम्हाजी का यज्ञ चालू था। तब यज्ञ की अग्नि का तेज इतना ज्यादा था कि भगवान वरदराज इस तेज को सह नही पा रहे थे। तब एक दिन भगवान वरदराज एक पुजारी के सपने में आए और कहा कि, मेरी प्रतिमा को मंदिर में बने अनंत सरस सरोवर में रख दे और पूजा के लिए एक अलग पत्थर की मूर्ती बनाई जाए। पुजारी ने सवाल किया की भगवान फिर हमें उस प्रतिमा के दर्शन कब होंगे प्रभु? जवाब मिला की हर 40 साल बाद एकबार 48 दिनों के लिए मेरी प्रतिमा को सरोवर से निकाला जाए। माना जाता है कि तभी से यह परंपरा बनी हुई हैं। जो आज भी निरंतर चालू है। 

        और एक पौराणिक कथा यह है कि, भगवान ब्रम्हा से नाराज होकर लक्ष्मी सावित्री यहाँ आई थी। तब उन्हे मनाने के लिए भगवान ब्रम्हा भी यहाँ आए थे। तब ब्रम्हाजी ने यहाँ एक यज्ञ किया। इस यज्ञ को नष्ट करने के लिए माता सावित्री ने वेगवती नदी का रूप धारण किया और वो यहाँ बहने लगी। माना जाता है कि भगवान विष्णु इस यज्ञ से वरदराज के रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु को वरदराज के रूप में देखकर माता सावित्री का क्रोध शांत हुआ। माना जाता है कि इसी स्थान पर देवशिल्पी विश्वकर्मा ने ब्रम्हाजी के कहने पर अंजीर के पेड़ की लकड़ी से भगवान वरदराज जी की प्रतिमा का निर्माण किया। 

मुगल आक्रमण से जुड़ी कहानी। 

       एक कहानी ऐसी भी प्रचलित है कि, जब दक्षिण भारत में मुगलों ने आक्रमण किये तब काफी मंदिरों का नुकसान हुआ। इस नुकसान से इस प्रतिमा को बचाने के लिए, उसकी रक्षा हेतु मंदिरों के पुजारियों ने इस प्रतिमा को पास मे बने सरोवर में छिपा दिया था। करीब 40 साल तक यह प्रतिमा पानी के भीतर रही। इसके बाद मंदिर के मुख्य पुजारी के दो बेटों ने इस प्रतिमा को सरोवर के बाहर निकाला। ताकि इसकी वे पूजा कर सके। माना जाता है कि, यह प्रतिमा करीब 48 दिनों तक मंदिर के गर्भगृह मे रही। फिर अचानक वह दुबारा उसी सरोवर में वापस चली गई। तब से यह परंपरा शुरू हुई की, भगवान अत्ति वरदराज की प्रतिमा को 40 साल बाद 48 दिनों के लिए निकाला जाएंगा। इससे पहले यह प्रतिमा 1939,1979 और 2019 में निकली गयी थी। अब यह प्रतिमा साल 2059 मे निकाली जाएंगी। 

         दोस्तों भगवान अत्ति वरदराज के प्रति एक और ऐसी भी मान्यता है कि, देवगुरु बृहस्पति इस प्रतिमा की सरोवर के अंदर पूजा करते हैं। 

सरोवर का पानी कभी नहीं सुखता। 

भगवान अत्ति वरदराज की प्रतिमा जिस अनंत सरोवर में रखी जाती है। उस सरोवर का पानी 40 साल में कभी कम नहीं होता और ना ही कभी यह सरोवर सुखता। है ना interesting। 40 साल बाद जब इस सरोवर से प्रतिमा को निकाला जाता है, तब इस सरोवर को खाली किया जाता है। और इस सरोवर का पानी पास के ही एक दूसरे सरोवर में छोड़ा जाता है। यह सरोवर, प्रतिमा निकाले गए दिन से 48 दिनों तक सुखा रहता है। 

        मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोग बताते है कि, 1979 मे जब भगवान को 48 दिनों बाद जलवास देने के लिए सरोवर में रखा गया था। तो उस रात को इतनी तेज बरसात हुई थी कि, पुरा सरोवर एक रात में ही पुरा भर गया था। 

प्रतिमा से जुड़ा रहस्य। 

       दोस्तों आप इस प्रतिमा से जुड़े एक रहस्य के बारे मे जानकार हैरान होंगे। जैसा हमने जाना की, भगवान अत्ति वरदराज की प्रतिमा अंजीर की लकड़ी से बनी हुई है। और यह प्रतिमा सालों से परंपरा के अनुसार पानी में रखी जाती है। फिर भी यह सड़ती नहीं। लगातार पानी में रहने के बावजूद भी इस प्रतिमा के मूल रूप में कोई भी बदलाव नही हुआ है। आपको जानकार हैरानी होंगी की, इस प्रतिमा पर किसी तरह का लेप नहीं किया जाता। जिसके कारण वह ना सड़ सके। जिस तरह इसे निकाला जाता है, वैसे ही फिर 48 दिनों बाद इसे सरोवर में रखा जाता है। लोगों का मानना है कि जब इस प्रतिमा का निर्माण किया गया होगा, तभी इसमें संभवतः कोई ऐसी धातु या फिर कुछ ओर ऐसी चीज जिससे वह लम्बे समय तक टिक पाए।कभी पानी से खराब ना हो सके। वह मिलाई गई होगी।

 भगवान वरदराज का नेकलेस

       भगवान अत्ति वरदराज के गले में एक हार है। उसका भी एक इतिहास रहा है। आपको बता दे की, हार को क्लाइव नेकलेस के नाम से जाना जाता है। जब ब्रिटिश अफसर रॉबर्ट क्लाइव सन 1700 मे मद्रास के गव्हर्नर  जनरल बने थे। तब उन्होंने अरकोट रियासत जितने के बाद रियासत में मिले खजाने से सबसे किमती नेकलेस को भेट स्वरूप मंदिर में दान दिया था। कहा जाता है कि जब रॉबर्ट क्लाइव गव्हर्नर जनरल बनकर मद्रास आए थे। तब वे पेट के किसी गंभीर बीमारी से त्रस्त थे। इस बीमारी के चलते वे एक दिन वरदराज मंदिर के पूजरियो से मिले। तब पुजारियो ने उनको चरणामृत और भोग खाने को दिया। जिसको खाने के बाद वे ठीक हो गए थे। इसी के कारण रॉबर्ट क्लाइव ने वह हार भगवान वरदराज को चढ़ाया था। 

सरोवर में 24 फिट का कुंड

 

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     सरोवर के भीतर भी भगवान वरदराज का स्थान तय है। दोस्तों सरोवर के मध्य में 24 फिट के एक कुंड का निर्माण किया हुआ है। इस कुंड पर अत्ति वरदराज मंडप बना हुआ है। इसी मंडप मे भगवान अत्ति वरदराज को जलवास दिया जाता है। दोस्तों हम सब जानते हैं कि लकड़ी पानी में तैरती है। क्योंकी लकड़ी का घनत्व पानी से कम होता है। लेकिन दोस्तों आपको बता दे, जब प्रतिमा को जलवास दिया जाता है। तब प्रतिमा पानी के उपर ना आए इसके लिए उस प्रतिमा पर पत्थर से बने सात शेषनाग रखे जाते है। जिनका वजन कई किलों का होता है। 

प्रतिमा के 48 दिन

 



        जब प्रतिमा सरोवर से निकाली जाती है। तब उसे शुरुआती के 31 दिन शयनमुद्रा में रखा जाता है। अंतिम 17 दिन प्रतिमा को खड़ा रखा जाता है। दोस्तों मंदिर की संपूर्ण पूजा व्यवस्था अयंगर ब्राह्मणों के हाथ मे होती है। अयंगर ब्राह्मणों के छह परिवार यह काम संभालते है। 

        भगवान अत्ति वरदराज के उत्सव का जब आयोजन किया जाता है। तब इस आयोजन के लिए तमिलनाडु और देशभर के अयंगर ब्राह्मणों को बुलाया जाता है। ये सभी लोग अपनी-अपनी क्षमता के मुताबिक मंदिर में सहयोग देते है। 

48 वे दिन की रात में जलवास

         48 वे दिन की रात भगवान अत्ति वरदराज की अंतिम पूजा की जाती है। इसी पूजा के बाद भगवान वरदराज को महाभोग लगाया जाता है। कहा जाता है कि यह भोग सामान्य भोग से कही ज्यादा होता है। इसी रात भगवान को फिर से उस पवित्र अनंत सरस सरोवर में जलवास दिया जाता है। दोस्तों आपको बता दे, इस विधी मे मंदिर के मुख्य पुजारी सहित कुछ खास कर्मचारी ही होते है। आम जनता को इससे दूर रखा जाता है। दोस्तों प्रतिमा को सरोवर से निकालते समय और जलवास देते समय किसी भी तरह के ढोल-ताशे, फटाके नही जलाएं जाते है। केवल वैदिक ऋचाओं का गायन वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा किया जाता है। मंदिर के मुख्य पुजारी और कुछ खास कर्मचारी मिलकर प्रतिमा को जलवास देने की विधी पूरी करते है। जलवास देने के पहले भगवान का सारा शृंगार निकाला जाता है। केवल एक वस्त्र और जनेऊ ही भगवान को जलवास देते समय धारण कराई जाती है। 

       दोस्तों यह जानकारी कैसी लगी हमें comment में जरूर बताए। 

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