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राज्यसभा को स्थायी सदन क्यों कहा जाता है? क्या है इसके पीछे की वजह?

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शायद आप जानते ही होंगे कि, लोकतांत्रिक सरकारे शक्ती संतुलन के सिद्धांत पर काम करती है। लिहाजा शक्ती संतुलन को बनाए रखने के लिए संसदीय व्यवस्था में दो सदनों का होना आवश्यक होता है।

भारत में 1952 के पहले चुनाव तक देश की संसद में केवल एक ही सदन हुआ करता था और वह था लोकसभा। उस समय राज्यसभा अस्तित्व में नहीं था। लेकिन लोकसभा जैसा देश के संसद में एक और सदन हो इसके लिए संविधान सभा में काफी चर्चा और बहस हुई। जिसके परिणाम स्वरूप में यह फैसला लिया गया था कि, भारत के संसद में दो सदन होंगे एक लोकसभा और दूसरा राज्यसभा। लोकसभा सदन को निचला सदन और राज्यसभा सदन को ऊपरी सदन भी कहा जाता है।

जब राज्यसभा सदन को बनाया गया, तब यह तय किया गया कि, इसकी सदस्य संख्या लोकसभा से कम होगी और उनका चुनाव जनता नही बल्कि राज्यो और केंद्रशासित प्रदेशों के विधानसभा के सदस्य करेंगे। इसका मकसद संसद में राज्यो और केंद्रशासित प्रदेशों को प्रतिनिधित्व देना था।

लिहाजा 23 अगस्त 1954 को राज्यसभा का गठन हुआ। जिसकी सदस्य संख्या सीमा 250  रखी गई। वर्तमान में यह सदस्य संख्या 245 है। इनमे से भी 12 सदस्य राष्ट्रपती चुनते हैं।

राज्यसभा को आख़िर स्थायी सदन सदन क्यों कहते हैं।

इसको समझने के लिए हमें दोनों सदनों के बारे में बात करनी होगी। तभी हम जान पाएंगे कि, क्यों राज्यसभा को स्थायी सदन कहते हैं।

हम सब जानते हैं कि, लोकसभा का चुनाव हर पांच साल बाद होता है। लेकिन राज्यसभा को यह नियम लागू नहीं होता है। जब लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होता है। मतलब उसके सभी सदस्यों का कार्यकाल एक साथ समाप्त होता है। जिस कारण लोकसभा के सभी 550 सीटों के लिए नए से चुनाव होते हैं। आसान भाषा में समझे तो, यहां लोकसभा के सभी 550 सदस्य एक साथ पांच साल के लिए चुने जाते हैं और जब उन सभी 550 सदस्यों का पांच साल का कार्यकाल पूरा होता है, तब सभी सदस्य एक साथ निवृत्त हो जाते है। मतलब लोकसभा सदन हर पांच साल बाद पूरा खाली हो जाता है और दुबारा पुरा भरा जाता है।

लेकिन जब हम बात राज्यसभा की करते हैं, तो इसका कोई निश्चित कार्यकाल नही है। पर इस सदन के सदस्यों का कार्यकाल निश्चित है और वह है छह साल। मतलब छह साल का कार्यकाल पूरा करने पर इस सदन के सदस्य निवृत्त होते हैं।

अब हर किसी के दिमाग में यह सवाल उठ रहा होगा कि, जब छह साल बाद राज्यसभा के सदस्य निवृत्त होते है, तो फिर राज्यसभा सदन भी छह साल बाद लोकसभा जैसा पुरा खाली होता होंगा। मतलब राज्यसभा का कार्यकाल छह साल हुआ।

लेकिन आपको बता दें कि, राज्यसभा के बारे में ऐसा नहीं होता है। राज्यसभा का कार्यकाल छह साल का नही है। बल्की इस सदन के सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है और वे भी सभी एक साथ निवृत्त नही होते है।। बल्की इस सदन के एक तिहाई (1/3) सदस्य हर दो साल बाद निवृत्त होते है और उतने ही दुबारा चुने जाते है।

कहने का तात्पर्य यह है कि, राज्यसभा के सारे सदस्य एक साथ निवृत्त ना हो कर, थोड़े थोड़े निवृत्त होते है और उतने ही भरे जाते है। जिस कारण यह सदन अनिश्चित काल तक स्थायी सदन बना रहता है।

इसके अलावा एक और कारण है, इस सदन को स्थायी सदन कहने का।

राष्ट्रपती लोकसभा सदन को उसका पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले भी भंग कर सकते हैं। लेकिन यह नियम राज्यसभा को लागू नहीं होता है। राष्ट्रपती राज्यसभा को भंग नहीं कर सकते हैं।

इसके अलावा अगर किसी कारणवश सरकार गिर जाती है, तो राष्ट्रपती लोकसभा को भंग कर देते है। इमरजंसी के स्थिती में भी लोकसभा को भंग किया जाता है। इतना ही नहीं अगर पंतप्रधान अपना राजीनामा देते है, या फिर पंतप्रधान की किसी कारणवश मृत्यु हो जाती है तब भी राष्ट्रपती लोकसभा को भंग कर देते है। आपको बता दें कि, यह लोकसभा भंग करने के सारे नियम केवल लोकसभा को लागू होते हैं राज्यसभा को नहीं। लोकसभा भंग होने पर भी राज्यसभा सदन अनंत काल बना रहता है। इसलिए राज्यसभा को स्थायी सदन कहा जाता है।

दोस्तों यह जानकारी आपको पसंद आए तो हमे कमेंट बॉक्स में जरूर बताए।

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